स्वामी विवेकानंद का नाम भारतीय इतिहास में एक महान विद्वान, संन्यासी और समाज सुधारक के रूप में दर्ज है, जिन्होंने मानवता की सेवा को अपना सर्वोच्च धर्म माना। वे न केवल आध्यात्मिक गुरु थे, बल्कि ऐसे विचारक भी थे जिन्होंने भारत को आत्मगौरव और आत्मविश्वास का संदेश दिया। लाखों युवाओं के आदर्श स्वामी विवेकानंद की आज जयंती है। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हुआ था। वह देश के ऐसे महापुरुष हैं, जिनकी शिक्षाएं आज भी युवाओं में ज्ञान का प्रकाश फैला रही हैं।आज सिलीगुड़ी में विवेक यात्रा निकाली जा रही है।इसमें सांसद राजू विष्ट शामिल होंगे। नगर निगम की ओर से भी कई कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि स्वामी विवेकानंद के जीवन में ज्ञान का प्रकाश कैसे फैला? इसका सारा श्रेय उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस को जाता है।विवेकानंद और उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस के बीच मुलाकात की वजह बहुत मजेदार है। दरअसल ये मुलाकात एक "रौशोगुल्ला" (मिठाई) की वजह से हुई, जिसने गुरु और शिष्य के नाम को हमेशा के लिए अमर कर दिया। "रौशोगुल्ला" बना विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस की मुलाकात की वजह: विवेकानंद के बचपन का नाम नरेंद्र था और उन्हें शुरू से ही "रौशोगुल्ला" (मिठाई) बहुत पसंद था। यही नहीं वह अन्य खाने की चीजों को लेकर भी बहुत उत्साहित रहते थे। उन्हें जितना रौशोगुल्ला पसंद था, उतनी ही आइसक्रीम भी पसंद थी। वह सर्दियों में भी आइसक्रीम खाने से नहीं चूकते थे। रामकृष्ण परमहंस से भी विवेकानंद "रौशोगुल्ला" खाने की वजह से ही मिले। दरअसल विवेकानंद के चचेरे भाई रामचंद्र दत्ता ने उन्हें बताया कि दक्षिणेश्वर मंदिर में रामकृष्ण परमहंस हर आने वाले को रौशोगुल्ला खिलाते हैं। इसलिए तुम्हें चलना चाहिए। चचेरे भाई की बात सुनकर विवेकानंद ने कहा कि अगर उन्हें मंदिर में रौशोगुल्ला नहीं मिला तो वह रामकृष्ण के ही कान खींच लेंगे। हालांकि जब विवेकानंद वहां गए तो बात सही भी निकली और विवेकानंद को रामकृष्ण के रूप में अपने गुरु भी मिल गए। 'स्वामी विवेकानंद: द फ़ीस्टिंग, फ़ास्टिंग मॉन्क' (Swami Vivekananda: The Feasting, Fasting Monk) नाम की किताब में इस बात का जिक्र मिलता है। इस किताब में विवेकानंद की खान-पान संबंधी तमाम बातों का जिक्र मिलता है। विवेकानंद के सीनियर्स, उनकी और स्वामी रामकृष्ण परमहंस की इस मुलाकात को 'मिठाइयों पर आधारित आध्यात्मिकता' कहते थे। लेकिन समय चक्र के साथ गुरु और शिष्य का रिश्ता इतना मजबूत हो गया कि एक शिष्य के रूप में विवेकानंद की मिसाल दी जाती है। उनकी गुरु भक्ति अनन्य थी।स्वामी विवेकानंद का जीवन आत्मविश्वास, साहस और सेवा की मिसाल रहा है। विश्व मंच पर भारत की आध्यात्मिक आवाज
स्वामी विवेकानंद को विश्व स्तर पर अमर बनाने वाली घटना अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में दिया गया उनका ऐतिहासिक भाषण है। इस भाषण ने भारत की आध्यात्मिक शक्ति को पूरी दुनिया के सामने स्थापित किया और युवाओं में आत्मगौरव की भावना जगाई। जोखिम से न भागें
स्वामी विवेकानंद के अनुसार,“जीवन में जोखिम लो, जीतोगे तो नेतृत्व करोगे, हारोगे तो मार्गदर्शन।”हार भी सीख का जरिया है। सेवा से मिलती है सच्ची खुशी स्वामी विवेकानंद ने कहा,
“दूसरों की सेवा करना ही सबसे बड़ा धर्म है।”सेवा से ही जीवन को सार्थकता मिलती है।अनंत संभावनाओं में विश्वास
वे युवाओं को याद दिलाते हैं,“कभी मत कहो कि मैं नहीं कर सकता, तुम अनंत हो।”सीमाएं केवल सोच में होती हैं।
फोकस का महत्व आज के मल्टीटास्किंग युग में उनका यह विचार बेहद अहम है। “एक समय में एक काम करो और पूरी आत्मा उसमें डाल दो।”डर से आगे ही जीत
वे कहते थे, “डर ही पतन और पाप का मुख्य कारण है।”
निर्भीक होकर फैसले लेने से ही जीवन में आगे बढ़ा जा सकता है। लक्ष्य तक रुकना नहीं : स्वामी विवेकानंद कहते हैं, “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।”
यह विचार युवाओं को आलस छोड़कर निरंतर प्रयास करने की प्रेरणा देता है।असंभव केवल भ्रम है
वे कहते हैं, “ब्रह्मांड की सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं।”
कमजोरी बाहर नहीं, हमारे नजरिए में होती है। संघर्ष ही प्रगति का संकेतउनका मानना था,
“जिस दिन समस्या न आए, समझो रास्ता गलत है।”संघर्ष आगे बढ़ने का प्रमाण है। सोच ही पहचान बनाती है
उनका मानना था,“हम वो हैं, जो हमें हमारी सोच ने बनाया है।”
नकारात्मक सोच व्यक्ति को कमजोर बनाती है, जबकि सकारात्मक सोच असंभव को भी संभव कर देती है।आत्मविश्वास से ही शुरुआत : स्वामी विवेकानंद का स्पष्ट संदेश था,“जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते, तब तक आप भगवान पर भी विश्वास नहीं कर सकते।” सफलता का पहला कदम आत्मविश्वास है। ( अशोक झा की कलम से )
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