भारत के फसल उत्सव कृषि परंपराओं से जुड़े ऐसे सांस्कृतिक आयोजन हैं, जो किसानों, प्रकृति और सूर्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।भारत में त्योहार केवल खुशियां मनाने का मौका नहीं होते, बल्कि ये हमारे जीवन, परंपरा और प्रकृति से भी हमें जोड़ते हैं। हर त्योहार का अपना एक खास इतिहास और कहानी होती है, जो हमें हमारे पूर्वजों की सोच, संस्कृति और जीवनशैली के बारे में बताती है। यह पर्व नई फसल के आने की खुशी में मनाते हैं. वैसे तो पोंगल दक्षिण भारत का प्रमुख त्योहार है लेकिन तमिलनाडु राज्य में पोंगल की धूम सबसे ज्यादा रहती है. पंचांग के अनुसार इस साल पोंगल 14 जनवरी 2026 से 17 जनवरी 2026 तक मनाया जाएगा. हर दिन अलग-अलग रस्में निभाई जाती हैं.
मटके में बनाते हैं पोंगल: पोंगल पर्व के पहले दिन मटके में दूध और नए चावल व गुड़ डालकर पोंगल नामक का पकवान बनाया जाता है. पोंगल बनाने के लिए जब मटके में दूध और चावल को पकाया जाता है, तब यदि दूध उफनकर मटके से बाहर आए तो इसे बेहद शुभ माना जाता है। जबकि आम दिनों में दूध का उफनना, जलना अशुभ माना जाता है। खासतौर पर दूध पूर्व दिशा की ओर गिरे तो यह बताता है कि घर में पूरे साल सुख-समृद्धि बढ़ेगी। जब ऐसा होता है तो महिलाएं खुश होकर शंख बजाती हैं और भगवान को धन-समृद्धि के लिए धन्यवाद देती हैं।
लोहड़ी, मकर संक्रांति, उत्तरायण और पोंगल जैसे त्योहार विविध क्षेत्रों में अलग-अलग रीति-रिवाजों के साथ मनाए जाते है। भारत की सांस्कृतिक संरचना में फसल उत्सवों का एक विशिष्ट और सम्मानजनक स्थान है. कृषि आधारित समाज में ये पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि किसानों के परिश्रम, प्रकृति की उदारता और सामुदायिक एकता का उत्सव हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में मनाए जाने वाले हार्वेस्ट फेस्टिवल्स स्थानीय जलवायु, फसल पैटर्न और परंपराओं के अनुसार भिन्न होते हैं, लेकिन इनका मूल भाव कृतज्ञता और समृद्धि ही रहता है। लोहरी: सर्दियों के अंत का उत्सव
लोहड़ी मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में मनाई जाती है। यह पर्व कठोर सर्दियों के अंत और दिन लंबे होने की शुरुआत का प्रतीक है। इस अवसर पर लोग अलाव के चारों ओर एकत्र होकर लोकगीत गाते हैं और भांगड़ा व गिद्दा जैसे पारंपरिक नृत्य करते हैं। अग्नि और सूर्य की पूजा के माध्यम से ऊष्मा, नवजीवन और आशा का संदेश दिया जाता है। मक्की की रोटी, सरसों का साग, पिन्नी, गुड़ गजक और हलवा जैसे व्यंजन सामाजिक मेल-जोल को और मजबूत करते हैं।
मकर संक्रांति: सूर्य उपासना और शुभ आरंभ
मकर संक्रांति सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का प्रतीक है और इसे सूर्य देव को समर्पित किया जाता है। यह पर्व देशभर में विभिन्न नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य और प्रार्थनाएं इस दिन का प्रमुख हिस्सा हैं। पतंग उड़ाना इस त्योहार की सबसे लोकप्रिय परंपराओं में से एक है, जो उल्लास और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती है. यह पर्व शीत अयनांत के समापन और शुभ काल की शुरुआत को दर्शाता है।
उत्तरायण:- रंगीन पतंगों का उत्सव
उत्तरायण विशेष रूप से गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र में उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। यह मकर संक्रांति के साथ ही पड़ता है और सूर्य देव तथा विद्या की देवी सरस्वती को समर्पित होता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध इस पर्व में आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है। मान्यता है कि इस समय सूर्य की किरणें शरीर और मन को शुद्ध करती हैं, जिससे उत्तरायण सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बन जाता है।
पोंगल: दक्षिण भारत का चार दिनों का पर्व
पोंगल मुख्य रूप से तमिलनाडु, पुडुचेरी और श्रीलंका के कुछ हिस्सों में मनाया जाने वाला चार दिवसीय फसल उत्सव है। ‘पोंगल’ शब्द का अर्थ उबाल आना या छलकना है, जो समृद्धि और प्रचुरता का प्रतीक है. भोगी पोंगल से शुरू होकर सूर्य पोंगल, मट्टू पोंगल और कन्नुम पोंगल तक चलने वाले इस पर्व में सूर्य देव को चावल, दूध और गुड़ से बना विशेष व्यंजन अर्पित किया जाता है. रंगीन कोलम, मवेशियों की पूजा, मंदिर दर्शन और पारिवारिक भोज इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं।
प्रकृति को देते हैं धन्यवाद: पोंगल पर्व नई फसल के आगमन की खुशी के साथ प्रकृति को धन्यवाद देने का मौका होता है. इस दौरान किसान अपनी फसलों के लिए सूर्य, इंद्र देव और पशुधन का आभार प्रकट करते हैं। इस उत्सव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है पोंगल डिश को तैयार करना।
थाई और सूर्य पोंगल: पोंगल पर्व के दौरान भोगी, थाई पोंगल और सूर्य पोंगल मनाते हैं। यानी कि सूर्य देव की पूजा करते हैं. मट्टू पोंगल में विशेष रूप से बैलों और गायों की पूजा की जाती है। उन्हें नहलाकर, सजाकर उनकी आरती की जाती है. साथ ही पोंगल पर खिचड़ी बनाई जाती है। नए चावल, मूंग दाल और घी से बनी खिचड़ी खाई जाती है।रंग-बिरंगी पतंगों से सजा आसमान, तिल-गुड़ की मिठास और खिचड़ी की खुशबू के साथ आने वाले उत्तरायण को देश के अधिकांश हिस्सों में मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। यह केवल एक पर्व नहीं बल्कि ऋतु परिवर्तन, सामुदायिक एकता और कृतज्ञता का उत्सव होता है।पंजाब या नॉर्थ इंडिया में लोहड़ी, तमिलनाडु में पोंगल उत्तर प्रदेश और बिहार में खिचड़ी पर्व के नाम से जाना जाता है, लेकिन हर जगह यह अपने धार्मिक गुणों और विरासत को उज्ज्वाल बनाता है। विक्रम संवत हो, जहां तिथियां और मास हैं या अंग्रेजी कैलेंडर हो जहां डेट और मंथ हैं, लेकिन मकर संक्रांति दिन 14-15 जनवरी की फिक्स है, सब कुछ बदलता है, लेकिन यह दिन ही नहीं बदलता है क्योंकि इसमें एस्ट्रोनॉमी और एस्ट्रोलॉजी दोनों का ही एक अटूट संबंध है।
सबसे पहले आप समझे कि संक्रांति का मतलब साथ मिल परिवर्तन का समय एक राशि का दूसरी राशि में जाना। सूर्य ग्रह का मकर राशि में जाना मकर संक्रांति कहलाता है जिसे हम सूर्य देवतुल्य का उत्तरायण होना भी कहते हैं। सूर्य देव 6 महीने उत्तरायण और 6 महीने दक्षिणायन रहते हैं।
आकाश में हमारी धरती अपनी धुरी पर 23.5 डिग्री पर झुकी हुई है और इसी झुकी हुई धरती के कारण जब धरती अपनी ऑर्बिट में सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है तो मौसम चेंज होते हैं और साथ-साथ धरती अपनी धुरी पर भी घूम रही है जिससे दिन रात होते हैं। विंटर सोल्स्टिस दिसंबर 21-22 को रात सबसे लंबी होती है इसके बाद से ही धीरे-धीरे सूर्य उत्तरायण होने लगता है।
मकर संक्रांति वाले दिन से जब सूर्य मकर राशि में आ जाता है उसे दिन से हम उत्तरायण की शुरुआत मानते हैं। उत्तरायण से दिन बड़े होने शुरू हो जाते हैं और राते छोटी होनी शुरू हो जाती है। ज्योतिष में सूर्य को हम आत्मा अथॉरिटी लाइफ फोर्स और डायरेक्शन मानते हैं। मकर राशि शनि की राशि है, जो डिसिप्लिन रिस्पांसिबिलिटी और एडमिनिस्ट्रेशन को दिखाती है कि जब सूर्य मकर राशि में आता है तो जातक कर्म ओरिएंटेड प्रैक्टिकल और समाज के प्रति उत्तरदायित्व को समझता है। इसलिए सूर्य को 10वें हाउस में दिग्बल प्राप्त होता है, जो उसे वर्क लीडरशिप और रिजल्ट ओरिएंटेड बनाता है।
सूर्य राजा है, अथॉरिटी है और मकर राशि गवर्नेंस को दिखाती है कि अथॉरिटी का जब सिस्टम से मिलन हो जाता है तो मैक्सिमम डायरेक्शनल पावर आ जाती है इसीलिए सूर्य कर्म की राशि में उज्ज्वमलता प्राप्त करता है। उत्तरायण सूचक हैं धर्म और कर्म की दिशा में वृद्धि ज्ञान लक्ष्य और उन्नति की दिशा माना गया है इस समय किए गए कम तेज फल देते हैं।
सूर्य उत्तरायण और दिग्बली होते ही देवतुल्य पितृ बल और सूर्य कारक मजबूत हो जाता है, पितृ दोष को शांत करता है मान सम्मान को बढ़ाता है सरकारी कार्यों में गति आ जाती है। स्वास्थ्य और मानसिक ऊर्जा में सुधार होता है। रोगों से लड़ने की क्षमता आती है, डिप्रेशन भ्रम आलस की कमी होती हैं और निर्णय लेने की शक्ति बढ़ती है।
हमारे श्रीमद्भागवत गीता के आठवें अध्याय के 24वें श्लोक से 27वें श्लोक तक इस बारे में विस्तृत रूप से समझाया गया है। महाभारत में महा तेजस्वी भीष्म पितामह की इच्छा मृत्यु भी उत्तरायण के समय फलीभूत हुई थी। इसी दिन सूर्य भगवान अपनी शत्रुता क्रोध भूलकर अपने पुत्र शनि भगवान से मिलने उनके घर गए थे इसलिए सूर्य यहां दिग्बल को प्राप्त करता है।
ऋषि भागीरथ अपने पितरों का उद्धार करने के लिए गंगा को इसी दिन धरती पर अवतरित कर लाए थे। उत्तरायण में सात्विक गुना की वृद्धि और दक्षिणायन में तामसिक गुना की वृद्धि होती है। उत्तरायण में किया गया छोटा सा प्रयास भी बड़ा फल देता है गंगा स्नान दान जप पूजा संकल्प नए काम मकर संक्रांति को करना शुभ माना गया है।
इस दिन तिल गुड़ का दान करने और खाने से सूर्य मजबूत और पितृ दोष में न्यूनता लाता हैं गंगा स्नान करना महान आध्यात्मिक कार्यों में लिखा गया है। विज्ञान उत्तरायण को पृथ्वी के टिल्ट होने से समझता है साइंस बताती है कि उत्तरायण कब होता है, लेकिन हमारी सनातन परंपरा इस सूर्य बेस सिस्टम को सूर्य देव के देव तत्व से जोड़ती है और हमारी संस्कृति बताती है कि इस समय को सूर्य देव का विशेष कृपा पात्र बन वैभवशाली बन मोक्ष प्राप्त किया जाएं। इसलिए मकर संक्रांति का पूर्व पूरे उत्साह और जोश से मनाना चाहिए। ( अशोक झा की रिपोर्ट )
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