- संघ किसी को विरोधी नहीं मानता, बल्कि सबको साथ लेकर चलने वाला संगठन
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सेवा, अनुशासन और समर्पण के सौ वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस महत्वपूर्ण शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में संघ प्रमुख डॉ मोहन राव भागवत कल देर शाम सिलीगुड़ी पहुंचे है। प्रणामी मंदिर के संस्थापक संत सदानंद जी महाराज ने समाज उत्थान के लिए किए जा रहे धर्म प्रचार पर बातचीत की।
उत्तर बंगाल प्रांत ने सिलीगुड़ी में दो विशेष कार्यक्रम आयोजित किए हैं। इसमें शताब्दी समारोह के उपलक्ष्य में, 18 दिसंबर 2025 यानि आज सेवक रोड स्थित शताब्दी सदन, सिलीगुड़ी में एक युवा सम्मेलन को संबोधित करेंगे। वे युवाओं को संघ, संघ का विस्तार और आने वाली चुनौतियों को बताएंगे। बताएंगे कि यदि परिवार का कोई व्यक्ति समाज और देश के लिए बलिदान हुआ है, तो हमें उस पर गर्व करना चाहिए। धर्म रक्षा के लिए गुरु तेग बहादुर जी और उनके शिष्यों के बलिदान का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि गुरु महाराज (गुरु गोबिंद सिंह जी) के साहिबजादों को निर्दयतापूर्वक दीवारों में चुनवा दिया गया, पर उन्होंने धर्म नहीं छोड़ा। कैसे भारत ने स्वाधीनता के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी, जिसमें जन्मजात देशभक्त डॉ. हेडगेवार जी ने भी भूमिका निभाई। उनके मन में यह विचार आया कि अंग्रेज तो चले जाएंगे, पर क्या केवल उनका जाना ही वास्तविक स्वतंत्रता होगी? इसी प्रश्न के उत्तर के रूप में संघ की स्थापना हुई। उन्होंने कहा कि भारत के महापुरुषों ने अपने जीवन मूल्यों की रक्षा के लिए बलिदान दिए। क्या भारत उन्हें याद रख पाएगा? इसी चिंता और भारत के ज्ञान व मूल्यों से विश्व को परिचित कराने के लिए संघ कार्य कर रहा है। भारत ने दुनिया को 64 कलाएं, व्याकरण, संगीत के सप्त स्वर और वैज्ञानिक दृष्टिकोण दिया। परंतु, संपन्न होने के बाद भी समाज आपस में लड़ने लगा। स्वाधीनता के बाद देश को एकता के सूत्र पिरोने का जो सपना उस समय स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था, उसे पूर्ण करने के लिए डॉ. साहब ने संघ की स्थापना की। स्वामी विवेकानंद के शिकागो सम्मेलन से वापस आने पर जब उनसे पूछा गया कि आप हमें क्या सीख देंगे तो उन्होंने कहा कि “आप संगठित रहो”। संगठन और सामाजिक परिवर्तन: संगठन का कार्य निरंतर चलना चाहिए, इसीलिए ‘शाखा’ की पद्धति विकसित की गई। जाति, भाषा, पंथ और ऊंच-नीच के भेदभाव के रहते संगठन संभव नहीं है, इसलिए ‘एक राष्ट्र-एक भाव’ का होना अनिवार्य है। संघ समाज में परिवर्तन लाने के लिए एक जीवंत संगठन है। समाज का मुख्य मार्ग ‘धर्म’ है, जिसका अर्थ है मनुष्य हित, राष्ट्र हित और प्रकृति हित। संघ किसी को विरोधी नहीं मानता, बल्कि सबको साथ लेकर चलने वाला संगठन है।भविष्य की दिशा पंच परिवर्तन: उन्होंने कहा कि भारत कभी केवल अपने लिए नहीं जिया; जब भी समृद्ध हुआ, विश्व कल्याण के लिए कार्य किया। आज भारत पुनः उठ खड़ा हुआ है। भारत भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में संतुलन बनाकर चलता है। इसी उद्देश्य हेतु संघ ने ‘पंच परिवर्तन’ के पांच विषयों को समाज के सम्मुख रखा है। सामाजिक समरसता – समाज से छुआछूत और भेदभाव को समाप्त करना।पर्यावरण संरक्षण – जल, जमीन और जंगल को बचाना, प्लास्टिक हटाना। कुटुंब प्रबोधन – परिवारों में संस्कार और संवाद को बढ़ावा देना।स्वदेशी जीवन शैली – अपनी भाषा, वेशभूषा, भजन और भोजन में भारतीयता को अपनाना।नागरिक कर्तव्य – समाज के प्रति अपने दायित्वों, नियमों का निर्वहन करना। इसे युवाओं को करना होगा। ( सिलीगुड़ी से अशोक झा की रिपोर्ट )
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