- आइए, हिन्दी दिवस पर इस गौरव को नई ऊँचाइयों तक ले जाने का संकल्प लें
- हिंदी हमारी मातृभाषा ही नहीं बल्कि हमारी संस्कृति, सभ्यता और परंपरा की आत्मा
आज का दिन हमे याद दिलाता है कि हिंदी सिर्फ एक भाषा नहीं है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान, भावनाओं को प्रकट करने और एकता का प्रतीक है। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने यह फैसला लिया कि हिंदी संघ की राजभाषा और लिपि देवनागरी होगी। क्योंकि भारत में ज्यादातर जगहों उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड, दिल्ली, बिहार, बंगाल, झारखंड, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ में हिंदी भाषा ही बोली जाती है। प्रत्येक राष्ट्र की एक आत्मा होती है, एक धड़कन होती है, जो उसके करोड़ों नागरिकों को एक सूत्र में बाँधती है। भारत के लिए वह धड़कन, वह आत्मिक स्वर हमारी हिन्दी है। यह केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति की गंगोत्री, हमारी भावनाओं का सेतु और हमारी राष्ट्रीय एकता का सबसे सशक्त आधार है।
हिन्दी दिवस 14 सितंबर को मनाया जाता है क्योंकि 1949 में इसी दिन संविधान सभा ने इसे भारत की राजभाषा का गौरव प्रदान किया था। जिस भाषा में बसता है हमारा संसार, हिंदी का हम सभी करें सत्कार। हिंदी ही वो भाषा है, जिसे हम एक दूसरे को अपनी बात समझाते हैं और यह भाषा हमारे लिए भावना है।
हिंदी है हमारी शान, यह भाषा है हमारी पहचान।हिंदी सिर्फ भाषा नहीं, भावना है. हिंदी दिवस पर गर्व के साथ बोलें…जय हिंदी! आओ मिलकर हिंदी भाषा को आगे ले जाएं, देश की एकता को और बढ़ाएं।हिंदी का मान बढ़ाएं, हर दिल में इसकी जगह बनाएं।हिंदी हमारी भाषा है, जो सभी राज्यों में बोली जाती है। हम अपनी भाषा का सम्मान हमेशा करें।हिंदी दिवस का संदेश यही है, बोली में अपनापन, भाषा में एकता।इस दिन पर संकल्प लें… हर दिन हिंदी को प्राथमिकता दें।हिंदी है राष्ट्र की पहचान, जिससे है हमारी शान। हिंदी भाषा से ही है भारतीय की पहचान. यहीं भाषा है हमारा गौरव। जिससे है हमारी पहचान।
जो अपने देश की भाषा को अपनाते हैं, वही सच्चे देशभक्त कहलाते हैं। हिंदी सिर्फ एक भाषा नहीं है, भावनाओं की अभिव्यक्ति है. जिससे हम अपनी भावना दूसरे को बता पाते हैं।
अपनी राजभाषा हिंदी को अपनाएं, बच्चों को इस भाषा में निपुण बनाएं। हिंदी भाषा हमारी पहचान और शान है, हिंदी दिवस पर इस अमूल्य धरोहर को नमन! राजभाषा हिंदी को करें प्रणाम, इसमें छिपा है देश का मान-सम्मान। हिंदी दिवस है हमारे लिए गर्व का दिन, हिंदी बोलो, लिखो और दिल से अपनाओं।हमारी भाषा हिंदी ही है हमारे देश की पहचान, इसमें छिपा है मान और सम्मान।हिंदी में बात करने से हिचकिचाएं नहीं, बच्चों को हिंदी बोलना और लिखना जरूर सिखाएं।
हिंदी भाषा का सम्मान करें,यही सच्चे भारतीय की पहचान है। हिन्दी दिवस का अवसर केवल एक भाषा का उत्सव नहीं, बल्कि उस शक्ति को पहचानने का आह्वान है, जो भारत को 'भारत' बनाती है। आज जब दुनिया अपनी-अपनी भाषाई जड़ों पर गर्व कर रही है, हमें भी यह समझना होगा कि हिन्दी को केवल पाठ्य पुस्तकों या सरकारी फाइलों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। यह हमारे विचारों, व्यवहार और सपनों में जीने वाली भाषा बने। यही असली उद्देश्य होना चाहिए। सरकार का राजभाषा विभाग हिंदी उद्धार के काम में लगा हुआ है पर 76 वर्ष बीतने पर भी प्रश्न उलझा ही है। अंग्रेजी के साथ प्रतिद्वंदिता में हिन्दी हीनता का पर्याय बनती गई: अंग्रेजी जानने वाला ही ज्ञानी और बाक़ी गंवार बन गए। यह दुर्योग ही है कि जो भाषा उपनिवेशवाद के खिलाफ खड़ी थी वह उपनिवेश ख़त्म होने के बाद बंदी बना ली गई। सरकारी कामकाज मुख्य रूप से अंग्रेज़ी में ही चलता रहा। देश की भाषाओं में न्याय, प्रशासन और उच्च शिक्षा में ज्ञानार्जन आदि की व्यवस्था न होने से आम जनता की कठिनाई बढ़ती रही। अब अंग्रेजी बोलना-जानना श्रेष्ठता का ऐसा प्रतीक बन चुका है कि हममें से कई लोग अपनी भाषा का तिरस्कार कर हिन्दी को हिंगलिश बनाने में ही कल्याण देख रहे हैं। इस परिदृश्य में राजनीति की मुख्य भूमिका रही है।
इस सबके बावजूद संवाद, संपर्क और ज्ञान की भाषा के रूप हिंदी की भारत में व्यापक उपस्थिति है। साल 1909 में महात्मा गांधी ने इन्डियन ओपिनियन में लिखते हुए यह कहा था कि सारे भारत के लिए जो भाषा चाहिए, वह हिन्दी ही होगी। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौर में हिन्दी देश की संपर्क भाषा बन गई। विद्यार्थी के रूप में बापू ने अंग्रेजी में पढ़ाई को ख़ुद एक अतिरिक्त भार के रूप में महसूस किया था जो ज्ञानार्जन में रोड़े अटकाती है। वह ख़ुद अधिकांश लेखन मातृभाषा गुजराती में करते थे। हिंदी का क्षेत्र हिमालय की तराई, नर्मदा, पंजाब, सिन्ध, गुजरात, बंगाल, छोटानागपुर तक विस्तृत है। इसकी सीमाएं बांग्ला, ओडिया, तेलुगु, नेपाली, पंजाबी, गुजराती और सिन्धी से जुड़ती हैं।
उल्लेखनीय है कि लचीली होने और व्यापक शब्द भण्डार के साथ जोड़ने की प्रवृत्ति के चलते राजा राममोहन राय, केशव चन्द्र सेन, स्वामी दयानंद, लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी आदि ने हिन्दी को अपना समर्थन दिया था। संस्कृत से निकली मराठी, बांग्ला, उड़िया और गुजराती भाषाओं से हिन्दी का निकट रिश्ता है। हिन्दी क्षेत्र जनसंख्या बहुल होने से व्यापार के लिए अच्छा बाजार भी उपलब्ध करा देता है। हिन्दी फ़िल्में, संगीत पूरे भारत में प्रचलित हैं। भारत की आधी से ज्यादा जनसंख्या हिन्दीभाषी है, शेष में ज्यादातर लोग हिन्दी को समझते हैं। हिन्दी भाषा आज भारतीय जन अभिव्यक्ति का सबल माध्यम है। मध्यदेश की हिन्दी और उसकी बोलियों का प्रसार व्यापक है।
हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को खोने का अर्थ सांस्कृतिक एकता, भारतीयता, भारतीय मानस, भारत की पहचान को भी खोना है। भारत की आत्मा भारत की भाषाओं और उनके साहित्य में बसती है। भारतीय चिंतन की धारा तिरुवल्लूर, नामदेव, शंकरदेव, तुलसीदास सबमें मिलती है। लोक-जीवन में सम्पर्क भाषा की भूमिका में हिन्दी काफ़ी पहले से रही है। आवश्यकता है कि हम औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलें और भारत को भारत की दृष्टि से समझें। बहुत दिनों के बाद भारत सरकार की नई शिक्षा नीति में यह संकल्प किया गया कि प्रारम्भिक शिक्षा को मातृभाषा के माध्यम से ही दिया जाय। प्रावधान तो यह भी है कि ऊँची कक्षाओं में भी ऐसी ही व्यवस्था रहे। भाषाओं के बीच परस्पर पूरकता भी है और हिन्दी इस संपर्क भाषा की भूमिका निभा सकने में समर्थ है।
यदि बापू ने राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र को गूंगा कहा था तो यही आशय था हिन्दी में संवाद सहज है। हिन्दी का विकास अंतर भाषा के रूप में हुआ था और अनेक अहिंदी भाषियों ने हिन्दी की इस शक्ति को पहचाना था। अंग्रेजी का मोह और हिंदी से असंतोष वैश्विकता के मकड़जाल में फँसने के कारण है जिसकी सीमाएं आए दिन प्रकट हो रही हैं। फ़्रांस, जर्मनी, स्पेन, पुर्तगाल, इसराइल, जापान, चीन और रूस जैसे छोटे-बड़े देश अपनी-अपनी भाषा में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की सफलतापूर्वक शिक्षा दे रहे हैं। इन सब देशों में अपनी भाषा के लिए गौरव है और भाषा को हर तरह से समृद्ध करने का निरंतर प्रयास भी हो रहा है।पहचान और स्वाभिमान का प्रतीक
हिन्दी भारत की वह डोर है जो कश्मीर से कन्याकुमारी और अरुणाचल से गुजरात तक हर भारतीय के दिल को जोड़ती है। जब हम अपनी मातृभाषा में सोचते, बोलते और सपने देखते हैं, तो हमारी अभिव्यक्ति गहरी और सच्ची होती है। अपनी भाषा को अपनाना अपनी जड़ों को सींचना है; यह उस आत्म-सम्मान को जगाना है, जो हमें विश्व पटल पर आत्मविश्वास से खड़ा करता है।
ज्ञान और नवाचार की भाषा
यह एक स्थापित सत्य है कि मौलिक चिंतन और रचनात्मकता का अंकुरण मातृभाषा में ही सबसे बेहतर होता है। यदि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा और प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में हिन्दी को ज्ञान की मुख्यधारा की भाषा बनाया जाए, तो हम अपने युवाओं की वास्तविक क्षमता को सामने ला सकेंगे। आत्मनिर्भर भारत का सपना तभी साकार होगा, जब ज्ञान हर भारतीय तक उसकी अपनी भाषा में पहुँचेगा।
बाज़ार और भविष्य की शक्ति: डिजिटल क्रांति के इस युग में हिन्दी एक वैश्विक शक्ति बनकर उभरी है। आज करोड़ों लोग इंटरनेट पर हिन्दी में पढ़ते, लिखते और संवाद करते हैं। ई-कॉमर्स से लेकर मनोरंजन तक, हिन्दी एक विशाल बाजार की भाषा है। जो कंपनियाँ इस शक्ति को पहचानेंगी, वे व्यावसायिक सफलता के साथ-साथ करोड़ों भारतीयों के दिलों तक भी पहुँच पाएँगी। हिन्दी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि एक रणनीतिक अवसर भी है।राष्ट्रीय चेतना और हमारा दायित्व: सरकारें अपनी नीतियों से हिन्दी को बढ़ावा देने का प्रयास करती रही हैं, लेकिन किसी भी भाषा का वास्तविक विकास केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं होता। इसके लिए समाज को आगे आना होगा। जब दफ्तरों की बैठकों, विद्यालयों की कक्षाओं, सामाजिक आयोजनों और घर की बातचीत में हिन्दी गर्व से बोली जाएगी, तभी यह भाषा सच्चे अर्थों में राष्ट्रभाषा कहलाएगी। गौरवशाली विरासत: एक नजर में: उत्पत्ति: हिन्दी की जड़ें हज़ारों वर्ष प्राचीन 'वैदिक संस्कृत' में हैं, जो विश्व की सबसे पुरानी ज्ञात भाषाओं में से एक है। समय के साथ यह आम जन की भाषा 'प्राकृत' और फिर 'अपभ्रंश' के रूपों से विकसित हुई, जिससे आधुनिक हिन्दी का जन्म हुआ।
विकास यात्रा: 10वीं शताब्दी में ब्रज, अवधी और अन्य बोलियों से ऊर्जा लेकर खड़ी बोली ने आधुनिक हिन्दी की नींव रखी।
साहित्यिक गंगा: कबीर के दोहे, तुलसीदास की चौपाइयाँ, सूरदास के पद, प्रेमचंद की कहानियाँ और हरिवंश राय बच्चन की कविताएँ—हिन्दी साहित्य ने विश्व को मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत परिचय दिया। ऐतिहासिक क्षण: 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिन्दी को भारत संघ की राजभाषा के रूप में अंगीकार किया। इसी दिन की स्मृति में हम प्रतिवर्ष ‘हिन्दी दिवस’ मनाते हैं।संकल्प हमारा: छोटे कदम, बड़ा बदलाव
ज्ञान के मंदिरों में: शिक्षक और विद्यार्थी संवाद, अध्ययन और शोध में हिन्दी को गौरवपूर्ण स्थान दें। कार्यालयों में: बैठकों, रिपोर्ट और ईमेल में हिन्दी का प्रयोग कर कार्य-संस्कृति को नई दिशा दें। परिवार में: बच्चों को हिन्दी कहानियाँ सुनाएँ, उन्हें लिखने और बोलने के लिए प्रेरित करें। डिजिटल जगत में: सोशल मीडिया पर गर्व से हिन्दी में लिखें और अच्छे हिन्दी कंटेंट को साझा कर बढ़ावा दें। एक संकल्प का दिन: हिन्दी दिवस केवल एक तारीख नहीं, बल्कि आत्म-चिंतन का अवसर है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हिन्दी को उसका वास्तविक सम्मान दिलाना केवल सरकार का नहीं, बल्कि हम 140 करोड़ भारतीयों का सामूहिक दायित्व है। हिन्दी केवल साहित्यकारों की नहीं, बल्कि वैज्ञानिकों, उद्यमियों, किसानों और युवाओं की भी भाषा है।।जब हर भारतीय के मन में हिन्दी के प्रति सम्मान और स्वाभिमान का भाव जागेगा, तभी यह भाषा सही मायनों में विश्व पटल पर अपनी पूरी शक्ति के साथ स्थापित होगी।
आइए, इस हिन्दी दिवस पर हम सब मिलकर अपनी भाषा को वह सम्मान दिलाएँ, जो हमारे राष्ट्र के मस्तक पर गौरव का तिलक बने। ( अशोक झा की कलम से )
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