- कवि गुरु रविन्द्र नाथ ठाकुर परिवार से जुड़ा है इसका नाता
- महाभारत काल में वनवास के दौरान कुंती ने की थी इसकी उपासना और पूजा
- जो आयेगा वह पाएगा,स्वयंभू शिव के साथ मां पार्वती का विश्व में यह इकलौता शिवलिंग
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: सावन के महीने का सोमवार शिव भक्तों के लिए खास होता है। इसके माध्यम से भगवान शिव की पूजा-उपासना करने से जीवन की हर समस्या का निवारण मिलता है। साथ ही, सावन में महादेव के नाम का जप करने से भी जीवन में शांति और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।माना जाता है कि इस महीने में भगवान शिव अपने हर भक्त की सभी तरह की मनोकामनाओं को पूरा करते हैं। ऐसे में पूर्वोत्तर का देवघर कहलाने वाला ठाकुरगंज का हर गौरी मंदिर की बात करना जरूरी है। अगर आप सावन में यहां नहीं आए तो जीवन में पछतावा रहेगा। जी हां हम बात कर रहे भारत -नेपाल बंगाल और बांग्लादेश की सीमावर्ती किशनगंज जिले के ठाकुरगंज में स्थापित में हर- गौरी मंदिर की। यहां का शिवलिंग स्वयं भू है। जिसके एक और मां पार्वती की आकृति इसकी महत्ता बढ़ाती है। रविंद्रनाथ टैगोर से जुड़े होने के कारण इसे पूर्वोत्तर का देवघर माना जाता है। सावन माह के मौके पर मंदिर प्रांगण में आने वाले भक्तों का इंतजार खत्म हो गया है। भक्तों में जबरदस्त उत्साह है। प्रत्येक सोमवार को देश विदेश से शिव भक्त महानंदा और मेची नदी से शिवभक्त कांवर लेकर जलाभिषेक को पहुंचते हैं। आज से ही भक्त परिवार समेत सम्मिलित हो रहे है। मंदिर में सोमवार को विशेष सजावट और श्रृंगार किया जाता है। नगर परिषद के द्वारा साफ सफाई की विशेष व्यवस्था की जा रही है। मंदिर से जुड़े बुजुर्ग लोगों का कहना है कि महाभारत काल में अज्ञातवास के दौरान इस शिवलिंग की पूजा पांडव और कुंती के द्वारा किया गया था। इस बात की प्रामाणिकता को इसलिए भी बल मिलता है क्योंकि यहां से मात्र 7 किलोमीटर दूर नेपाल के कीचक में भीम ने कीचक का वध किया था। जिसका प्रमाण आज भी वहां विद्यमान है। पुरातत्व विभाग को चाहिए कि इस अलौकिक शिवलिंग का हर प्रकार के संरक्षण करें। इस ऐतिहासिक मंदिर को शिव सर्किट से जोड़ें।
क्यों है यह महत्वपूर्ण शिवलिंग और स्थान: ठाकुरगंज का प्राचीन नाम कानपुर है। 1880 ई० में रविन्द्र नाथ टैगोर के वंशज सर ज्योतीन्द्र मोहन ठाकुर ने खरीदा। उसी समय इसका नाम बदलकर ठाकुरगंज रखा गया। 1897 ई० में ठाकुर परिवार द्वारा पूर्वोत्तर कोण में पाण्डव काल के भग्नावशेष की खुदाई कराया जा रहा था। इसके बीच बांस के झाड़ कि नीचे से इस शिवलिंग के साथ कई और शिवलिंग को देखा गया। इस शिवलिंग की अपनी अलग पहचान है यह एक फुट उँचा काले पत्थर का है। जिसमें आधा जगतजननी माता पार्वती अंकित है। ठाकुर परिवार इसे कलकत्ता में स्थापित करना चाहते थे। किन्तु स्वप्न में निर्देश प्राप्त होने पर उसे कोलकोता से लाकर टीन के बने छोटे मकान में बंगला सम्वत 21 माघ 1947 को ठाकुर परिवार द्वारा ठाकुरगंज मे स्थापित कर दी गई । ठाकुर परिवार द्वारा मन्दिर प्रांगण में लगी प्लेट के आधार पर यह प्रमाणित है कि 8 फरवरी 1901 से हर गौरी मन्दिर की पूजा अर्चना प्रारंभ हुई। ठाकुर परिवार द्वारा नियुक्त पुरोहित भोलानाथ गांगुली का परिवार आज भी मंदिर के पूजा में कार्यरत है। इस शिवलिंग की पुरे भारतवर्ष मे अलग पहचान है। इस मन्दिर को हर गौरी धाम के नाम से जाना जाता है। यहां आने वाले सभी भक्तों की मनोकामना निश्चित रूप से पूर्ण होती है। यही कारण है कि यहां राजनीतिक हो या देश विदेश के नेता अभिनेता और भक्त अपनी मनोकामना मांगने पहुंचते हैं। शिव मंदिर का जीर्णोद्धार शहर के ही। इस मंदिर निर्माण के पीछे भी एक लंबी और अद्भुत कहानी है। मंदिर के100 वर्ष पूरा होने पर मंदिर के रंग रोगन के साथ शताब्दी उत्सव फरवरी 2001में संपन्न हुआ था।125 वीं वर्षगांठ पर एक बार फिर से हर गौरी मंदिर को श्वेत संगमरमर से कुशल कारीगर के माध्यम से सजाया और सवारा जा रहा है।
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