23 अप्रैल 2017 को आशा भोसले जब काशी आई तो उनका स्वागत अभूतपूर्व रहा। वाराणसी में आयोजित संगीत महोत्सव के दौरान जब वह मंच
पर पहुंचीं तो “हर-हर महादेव” के जयघोष और प्रशंसकों के अपार प्रेम से
भावुक हो उठीं थीं। भावुक शब्दों में उन्होंने कहा था कि बनारसी साड़ी की तरह ही यहां के लोग
भी बहुत खूबसूरत हैं। आध्यात्मिक पक्ष को साझा करते हुए उन्होंने बताया था कि वह भगवान शिव की गहरी भक्त हैं। आज आशा भोंसले जी के निधन का समाचार सुनकर मन बहुत भारी हो गया। वाराणसी
में मेरे मंडलायुक्त के कार्यकाल के दौरान उनका हमारे आवास पर आना आज फिर
गहरी आत्मीयता के साथ याद आ रहा है। वह एक छोटी-सी मुलाकात थी, पर स्मृति
बहुत बड़ी बन गई। उनके व्यक्तित्व
में एक ऐसी सहज गर्माहट थी कि औपचारिकता टिकती ही नहीं थी। लगता था जैसे
कोई बहुत अपना व्यक्ति सामने बैठा हो। शायद यही कारण है कि उनकी आवाज़ भी
हमेशा इतनी अपनी लगती थी। उनके गीतों ने हमारे जीवन के न जाने कितने क्षणों को छुआ है—
“आईये मेहरबाँ”, “उड़े जब-जब ज़ुल्फें तेरी”, “पिया तू अब तो आजा”, “दम मारो दम”, “चुरा लिया है तुमने जो दिल को”, “इन आँखों की मस्ती”, “दिल चीज़ क्या है”, “मेरा कुछ सामान”।
और मराठी में—“बुगडी माझी सांडली गं”, “मला जाऊ द्या ना घरी”, “रेशमाच्या रेघांनी”, “जांभूळ पिकल्या झाडाखाली”—ये गीत भी हमेशा दिल के बहुत पास रहेंगे।
आज उन्हें याद करते हुए वही मुलाकात, वही मुस्कान, वही अपनापन मन में उभर रहा है।
ऐसी आवाज़ें कभी सचमुच दूर नहीं जातीं। ( यूपी के सीनियर आईएएस नितिन रमेश गोकर्ण की फेसबुक वॉल से साभार)
“आईये मेहरबाँ”, “उड़े जब-जब ज़ुल्फें तेरी”, “पिया तू अब तो आजा”, “दम मारो दम”, “चुरा लिया है तुमने जो दिल को”, “इन आँखों की मस्ती”, “दिल चीज़ क्या है”, “मेरा कुछ सामान”।
और मराठी में—“बुगडी माझी सांडली गं”, “मला जाऊ द्या ना घरी”, “रेशमाच्या रेघांनी”, “जांभूळ पिकल्या झाडाखाली”—ये गीत भी हमेशा दिल के बहुत पास रहेंगे।
आज उन्हें याद करते हुए वही मुलाकात, वही मुस्कान, वही अपनापन मन में उभर रहा है।
ऐसी आवाज़ें कभी सचमुच दूर नहीं जातीं। ( यूपी के सीनियर आईएएस नितिन रमेश गोकर्ण की फेसबुक वॉल से साभार)

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