बंगला नववर्ष के साथ मिथिलावासियों का भी शुरू होगा नया साल
बंगाल के सीमावर्ती और मिथिलांचल में 'जुड़-शीतल' केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का एक जीवंत उदाहरण है।जहां आधुनिक दुनिया वृक्षारोपण अभियानों की बात करती है, वहीं यहां सदियों से वृक्षों के साथ भावनात्मक संबंध निभाया जा रहा है। वृक्षों को देवतुल्य मानने से उनका संरक्षण स्वतः सुनिश्चित हो जाता है।मिथिलांचल की लोक-संस्कृति में प्रकृति और देवत्व के बीच की दूरी बेहद कम मानी जाती है। यहां वनस्पतियों को केवल हरियाली नहीं, बल्कि देव-अंश का स्वरूप माना जाता है।इसी भावना का सशक्त उदाहरण ‘जुड़-शीतल’ पर्व में देखने को मिलता है। इस दिन घर के बुजुर्ग बाग-बगीचों में जाकर वृक्षों को संतान के समान आशीर्वाद देते हैं और उन्हें जल अर्पित कर शीतलता प्रदान करते हैं। इस वर्ष यह पर्व 14-15 अप्रैल को मनाया जाएगा।इसी दिन सूर्यदेव मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करेंगे, जिसे मेष संक्रांति कहा जाता है।
शुभ संयोग और धार्मिक महत्व इस वर्ष सतुआनी पर शतभिषा नक्षत्र के साथ शुक्ल, सिद्ध और त्रिपुष्कर योग का दुर्लभ संयोग बन रहा है। इस मंगलकारी समय में सत्तू, गुड़, मिट्टी का घड़ा (घट), आम और पंखे का दान करना पितरों की शांति और अक्षय पुण्य फल की प्राप्ति के लिए उत्तम माना गया है। ग्रीष्म ऋतु के आगमन पर शरीर को शीतलता देने के लिए इस दिन सत्तू और कच्चे आम की चटनी खाने की प्राचीन परंपरा है। पंडित अभय कुमार झा और हरिमोहन झा बताते हैं कि मिथिलांचल में प्रत्येक वनस्पति को ‘देव-श्रेणी’ में रखा गया है। इसका कारण यह है कि वनस्पतियां जीवन को पोषण देती हैं और रस तथा गंध का आधार होती हैं। इसलिए प्रकृति द्वारा प्रदत्त हर वस्तु को देवतुल्य मानकर पूजने की परंपरा यहां सदियों से चली आ रही है। ‘जुड़-शीतल’ इसी परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसमें वृक्षों को जल देकर उन्हें शीतल किया जाता है और आशीर्वाद दिया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे परिवार के बच्चों को दिया जाता है। इस पर्व की शुरुआत तुलसी से होती है। झा के अनुसार, तुलसी को पूर्ण रूप से देव-अंश माना जाता है, इसलिए सबसे पहले तुलसी-वृंदा को जल अर्पित किया जाता है। इसके बाद आम के पौधे की पूजा की जाती है, जो मिथिला के सामाजिक और धार्मिक जीवन का अहम हिस्सा है। विवाह, उपनयन और गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्यों में आम्र-पल्लव का विशेष महत्व होता है।इसके बाद पीपल, जिसे पुराणों में विष्णु का स्वरूप माना गया है, फिर बरगद, पलाश और अन्य छायादार एवं औषधीय वृक्षों की पूजा की जाती है। मान्यता है कि ये सभी वृक्ष किसी न किसी रूप में मानव जीवन और सृष्टि के लिए लाभकारी ऊर्जा प्रदान करते हैं।‘जुड़-शीतल’ का शाब्दिक अर्थ है जोड़ना और शीतल करना। ग्रीष्म ऋतु के आगमन से पहले, जब धरती तपने लगती है, तब वृक्षों की जड़ों में जल देकर उन्हें ठंडक दी जाती है। यह परंपरा प्रतीकात्मक और व्यावहारिक दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।प्रतीकात्मक रूप से यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का माध्यम है, क्योंकि वृक्ष पूरे वर्ष छाया, फल और ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। वहीं व्यावहारिक रूप से यह ग्रीष्म से पहले की सिंचाई है, जिससे पेड़ भीषण गर्मी को सहने में सक्षम हो पाते हैं। इस दिन घर के वरिष्ठ सदस्य सुबह स्नान कर कलश में जल लेकर बाग-बगीचों की ओर जाते हैं. वे सबसे पहले तुलसी चौरा पर जल अर्पित करते हैं, फिर आम, पीपल और बरगद के वृक्षों की जड़ों में जल देते हैं. इस दौरान मौन प्रार्थना या पारंपरिक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है।बच्चों को भी साथ ले जाया जाता है, ताकि नई पीढ़ी वृक्षों को ‘जीवित संबंधी’ के रूप में देखना सीखे. कई परिवारों में वृक्षों के तने पर मौली बांधने और हल्दी-चावल अर्पित करने की भी परंपरा है।
मिथिलांचल में ‘जुड़-शीतल’ केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का एक जीवंत उदाहरण है। जहां आधुनिक दुनिया वृक्षारोपण अभियानों की बात करती है, वहीं यहां सदियों से वृक्षों के साथ भावनात्मक संबंध निभाया जा रहा है. वृक्षों को देवतुल्य मानने से उनका संरक्षण स्वतः सुनिश्चित हो जाता है. डॉ. झा के अनुसार, हमारे जीवन में भोजन का स्वाद, हवा की सुगंध और औषधियों का सार सब कुछ वनस्पतियों पर ही निर्भर है, इसलिए उन्हें देव-श्रेणी देना पूरी तरह तर्कसंगत है.
इस वर्ष 15 अप्रैल को मनाए जाने वाले इस पर्व को लेकर विशेष मान्यता भी है. पंचांग के अनुसार यह दिन ऐसा होता है जब सूर्य की स्थिति और भूमि की उष्मा संतुलन में रहती है. बुजुर्गों का मानना है कि इस दिन वृक्षों को दिया गया जल उनकी जड़ों तक गहराई से पहुंचता है और पूरे ग्रीष्म ऋतु में उन्हें पोषण प्रदान करता है।
शहरी क्षेत्रों में, जहां बाग-बगीचों की कमी है, वहां लोग गमलों में लगे तुलसी, नीम और करी पत्ता जैसे पौधों को जल देकर इस परंपरा को निभाते हैं. विद्यालयों में भी इस दिन बच्चों को पौधों को पानी देने के लिए प्रेरित किया जाता है, जिससे लोक परंपरा और पर्यावरण शिक्षा का समन्वय हो सके.
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कुल मिलाकर ‘जुड़-शीतल’ मिथिलांचल की ऐसी सांस्कृतिक धरोहर है, जो धर्म, कृषि ज्ञान और पर्यावरण संरक्षण को एक सूत्र में बांधती है. यह पर्व यह संदेश देता है कि वृक्ष केवल संसाधन नहीं, बल्कि परिवार का विस्तार हैं जिन्हें समय-समय पर देखभाल, सम्मान और स्नेह की आवश्यकता होती है. जब बुजुर्ग वृक्षों की जड़ों में जल अर्पित करते हैं, तो वे केवल परंपरा का निर्वहन नहीं करते, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की सीख भी देते हैं। (
अशोक झा की रिपोर्ट)


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