बंगाल में सरस्वती पूजा सिर्फ विद्या की आराधना नहीं, बल्कि युवाओं के लिए प्यार, दोस्ती और रिश्तों का खास दिन भी है
जानिए क्यों बसंत पंचमी को बंगाल का अनौपचारिक वैलेंटाइन डे कहा जाता है। जब पढ़ाई की कॉपियां देवी सरस्वती के चरणों में रख दी जाती हैं, तब बंगाल के छात्रों को सिर्फ पढ़ाई से नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की भागदौड़ से भी एक दिन की राहत मिलती है। सरस्वती पूजा यहां सिर्फ विद्या की आराधना नहीं, बल्कि युवाओं के लिए दोस्ती, अपनापन और पहली मोहब्बत को महसूस करने का खास मौका भी बन चुकी है। यही वजह है कि पश्चिम बंगाल में इसे अक्सर 'बंगाली वैलेंटाइन डे' कहा जाता है।बंगाल में दुर्गा पूजा की तरह ही यहां बड़े-बड़े पंडाल बनाए जाते हैं।मिट्टी की सुंदर प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं और पूरी रात उत्सव जैसा माहौल रहता है,वहीं उत्तर भारत में पूजा व्यक्तिगत या संस्थागत अधिक होती है, स्कूलों में प्रार्थना सभाएं होती हैं और घरों में पीले चावल बनाए जाते हैं।
बंगाल में छोटे बच्चों की पढ़ाई की शुरुआत इसी दिन 'हाते खोड़ी' अनुष्ठान से होती है जिसमें बच्चा पहली बार स्लेट पर चाक से अक्षर लिखता है, जबकि उत्तर भारत में यहां बच्चों को मंदिर ले जाकर आशीर्वाद दिलाया जाता है लेकिन लिखने की कोई विशेष रस्म उतनी प्रचलित नहीं है।
बंगाल में यह दिन युवाओं के लिए विशेष है, लड़के पीले कुर्ते और लड़कियां पीली साड़ियों में सजकर बाहर निकलती हैं, इसे बंगाल का वैलेंटाइन डे भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन युवाओं को घुलने-मिलने की सामाजिक छूट मिलती है।बंगाल में एक अनोखी परंपरा के तहत, छात्र अपनी किताबें और पेन मां सरस्वती के चरणों में रख देते हैं और उस दिन पढ़ाई नहीं करते। जबकि उत्तर भारत में किताबों की पूजा की जाती है लेकिन पढ़ाई छोड़ने का कोई सख्त नियम नहीं है।
बंगाल में 'खिचड़ी' और 'लाबड़ा'( मिक्स सब्जी) का भोग अनिवार्य है। साथ ही 'कुल' यानी बेर के फल को पूजा से पहले खाना वर्जित माना जाता है, वहीं उत्तर भारत में केसरिया भात, पीले लड्डू और मालपुआ बनाने की परंपरा अधिक है। पढ़ाई से पूजा तक, और पूजा से दोस्तों तक:
सरस्वती पूजा के दिन छात्र-छात्राएं अपने किताब-कॉपी देवी के सामने अर्पित कर आशीर्वाद लेते हैं। इसके बाद पूरा दिन उनके लिए खुला होता है। स्कूल और कॉलेज खुले रहते हैं, लेकिन माहौल पढ़ाई वाला नहीं होता। पारंपरिक कपड़ों में सजे युवा, दोस्तों के साथ घूमते नजर आते हैं और कई बार यही दिन पहली डेट का भी गवाह बन जाता है।
पीले रंग में सजा बसंत और हाथों में हाथ: बसंत पंचमी का रंग पीला माना जाता है और बंगाल में यह रंग हर तरफ दिखाई देता है। लड़कियां साड़ी में और लड़के कुर्ता-पायजामा पहनकर पंडालों में घूमते हैं। कई युवा जोड़े एक जैसे रंग के कपड़ों में हाथों में हाथ डाले चलते दिखते हैं। यह नज़ारा इस दिन को और भी खास बना देता है।
बसंत ऋतु और मोहब्बत का मेल: सर्दियों की विदाई, खिलते फूल और चहचहाते पक्षी, बसंत पंचमी का मौसम खुद में ही रोमांटिक होता है। पेड़ के नीचे बैठकर बातें करना, सड़क किनारे फुचका या आइसक्रीम खाना, और बिना किसी दिखावे के साथ वक्त बिताना, यही इस दिन की असली खूबसूरती है। कई बार हल्की-सी पसंद इसी दिन गहरे रिश्ते में बदल जाती है।
क्यों कहा जाता है 'बंगाली वैलेंटाइन डे': हिंदू पंचांग के अनुसार माघ महीने की शुक्ल पंचमी को सरस्वती पूजा मनाई जाती है। देवी सरस्वती को ज्ञान, संगीत और कला की देवी माना जाता है। लेकिन पश्चिम बंगाल में इस पूजा ने समय के साथ एक अलग सामाजिक रंग भी ले लिया है। जहां वैलेंटाइन वीक को कई लोग जरूरत से ज्यादा व्यावसायिक मानते हैं, वहीं सरस्वती पूजा आज भी सादगी, परंपरा और भावनाओं से जुड़ी हुई है। कोलकाता सिलीगुड़ी समेत पूरे बंगाल में यह दिन सिर्फ धार्मिक नहीं, सांस्कृतिक उत्सव भी है। पंडालों में घूमते युवा, हंसी-मजाक, और बिना किसी दबाव के रिश्तों को समझने का मौका, यही सरस्वती पूजा को खास बनाता है। शायद इसी कारण इसे बंगाल का अनौपचारिक वैलेंटाइन डे कहा जाता है, जहां प्यार दिखावे से नहीं, सादगी से झलकता है। ( अशोक झा की रिपोर्ट )
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